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Akele baith kar main jab bhi tumko yad karti hu by Ankita singh


बदल जाए तमन्ना की इकाई अगर दहाई में बदल जाए,
पहाड़ों सा मेरा जीवन रुबाई में बदल जाए। 
तुम अपने आप में ले लो तो मेरा शून्य सा जीवन, सफलता की किसी स्वर्णिम निताई में बदल जाए।
जो मौन हैं उनके लिए एक मुक्तक- 
सांस के गीत को सांस गुन ले अगर,
आंख के सीप अश्क चुन ले अगर, प्रेम का पूर्ण संवाद हो जाएगा,
मौन ने जो कहा, मौन सुन ले अगर।

धन्यवाद, अच्छा सुन रहे हैं तो मेरा भी मन बढ़ गया है, मैं सोचती हूं कि एक गीत सुना दूं-
अकेले बैठकर तुमको कभी जब याद करती हूं,
मैं तुमको याद करती हूं,
हां तुमको याद करती हूं,
मैं रोना मुस्कुराना हाय दोनों साथ करती हूं, अकेले।
इसका पहला अंतरा पढ़ती हूं, जब प्रेम में होते हो तो किस तरह मोबेलिटी बढ़ जाती है जरा सुनिएगा
यहीं सोफे पर बैठकर सात अंबर घूम आती हूं,
तुम्हारा नाम जपती हूं नशे में झूम जाती हूं।
कहां हूं मैं जहां मेरी खबर मुझ तक नहीं आती। 
क्या मेरी गुमशुदी की ये खबर तुम तक नहीं जाती।
गली दिल की तुम्हारी याद से आबाद करती हूं,
अकेले बैठकर जब कभी मैं याद करती हूं।
क्या होता है जब वो चला जाता है कैसा माहौल होता है, सुनिएगा
तेरा जाना मेरी आंखों में प्यासे ख्वाब बोता है,
तेरा तकिया लिपटकर मुझसे सारी रात सोता है, तेरी खुशबू मेरी सांसों की गलियों में टहलती हैं,
बड़ी कमबख्त हैं ये याद आखों में पिघलती हैं, मैं सारी रात सोना जागना एक साथ करती हूं।
अकेले बैठकर तुमको कभी जब याद करती हूं।
और इसका आखिरी अंतरा पढ़ती हूं। ये जमाना जो है सोशल मीडिया का जमाना है, मैंने ये प्रयोग करने की कोशिश की है, कहां तक सफल हुई हूं आपकी तालियां ये निर्धारित करेंगी, सुनिएगा

तेरी बातों के फूलों से गजल मखदूम करती हूं,
मैं चुपके से तेरी डीपी को जब भी जूम करती हूं,
तेरी फूंके हुए सिगरेट में अक्सर राख होती हूं,
तेरी लत में कभी धुआं कभी खाक होती हूं,
मैं अपने जख्म पर अश्कों की खुद बरसात करती हूं,
अकेले बैठकर तुमको कभी जब याद करती हूं,
मैं तुमको याद करती हूं मैं रोना मुस्कुराना हाय दोनों साथ करती हूं।

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